हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हज और ज़ियारत अनुसंधान केंद्र के प्रमुख हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन रुस्तमनजाद ने “कुरआन की दृष्टि में इंतकाम और ख़ून का बदला” विषय पर आयोजित एक बैठक में कहा कि कुरआन की दृष्टि में क़िसास, इंतकाम और “सारुल्लाह” अलग-अलग अवधारणाएं हैं।
उन्होंने कहा कि क़िसास एक व्यक्तिगत अधिकार है, जिसे शरीयत के निर्धारित नियमों और न्यायिक निगरानी में लागू किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य बदला लेना नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा और हत्या तथा अपराध के प्रसार को रोकना है। साथ ही क़िसास की व्यवस्था में माफ़ी और सुलह की भी गुंजाइश है।
रुस्तमनजाद ने कहा कि कुरआन में ईश्वरीय इंतकाम का संबंध दंड और अज़ाब से है और यह केवल एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति से बदला लेने तक सीमित नहीं है। ईश्वरीय दंड कभी-कभी मनुष्यों के माध्यम से भी लागू हो सकता है, जैसा कि बद्र के युद्ध के संदर्भ में देखा जाता है।
“सारुल्लाह” की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि यदि इसका अर्थ केवल हत्यारे से क़िसास लेना होता, तो इमाम हुसैन (अ) के हत्यारों को दंड मिलने के बाद यह विषय समाप्त हो जाता। जबकि रिवायतों में इमाम-ए-अस्र (अज) के ज़हूर को इमाम हुसैन (अ) के ख़ून की मांग और कर्बला की घटना के इंतकाम से जोड़ा गया है।
उन्होंने कहा कि कर्बला में केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं हुई, बल्कि इमामत और विलायत के ईश्वरीय पद पर भी आक्रमण हुआ। इसलिए कर्बला के इंतकाम को केवल हत्यारों को सज़ा देने के रूप में नहीं समझा जा सकता, बल्कि इसमें एक विचारधारा और प्रवृत्ति का सामना भी शामिल है।
उन्होंने बनी इस्राईल से संबंधित कुरआनी आयतों का हवाला देते हुए कहा कि ईश्वरीय इंतकाम किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं होता, बल्कि किसी प्रवृत्ति या विचारधारा के विरुद्ध ऐतिहासिक रूप से भी जारी रह सकता है।
अंत में उन्होंने कहा कि इंतकाम की अवधारणा को आम धारणाओं के आधार पर नहीं, बल्कि कुरआनी आयतों और रिवायतों के आधार पर वैज्ञानिक और सटीक तरीके से समझने की आवश्यकता है।
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